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शेर
तुम आओ मर्ग-ए-शादी है न आओ मर्ग-ए-नाकामी
नज़र में अब रह-ए-मुल्क-ए-अदम यूँ भी है और यूँ भी
साइल देहलवी
शेर
मंज़िल-ए-मर्ग के आ पहुँचे हैं नज़दीक अब तो
कर मदद ऐ नफ़स-ए-बाज़-पसीं थोड़ी सी
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
फ़र्बा-तनी की फ़िक्र में नादाँ हैं रोज़-ओ-शब
आख़िर को जानते नहीं है ये ग़िज़ा-ए-मर्ग
जुरअत क़लंदर बख़्श
शेर
अल्लाह रे ज़ौक़-ए-दश्त-नवर्दी कि बाद-ए-मर्ग
हिलते हैं ख़ुद-ब-ख़ुद मिरे अंदर कफ़न के पाँव
मिर्ज़ा ग़ालिब
शेर
समझे हैं अहल-ए-शर्क़ को शायद क़रीब-ए-मर्ग
मग़रिब के यूँ हैं जमा ये ज़ाग़ ओ ज़ग़न तमाम
हसरत मोहानी
शेर
होवे न अज़ाब उस पे कभी जिस के पस-ए-मर्ग
छाती पे हो तावीज़ तिरे नक़्श-ए-क़दम का
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
साहिबान-ए-क़स्र को मिलती नहीं है ब'अद-ए-मर्ग
गोर में सर के तले तकिया की जागा एक ख़िश्त