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शेर
गो कि हम सफ़्हा-ए-हस्ती पे थे एक हर्फ़-ए-ग़लत
लेकिन उठ्ठे भी तो इक नक़्श बिठा कर उठे
मोमिन ख़ाँ मोमिन
शेर
मैं न जानूँ काबा-ओ-बुत-ख़ाना-ओ-मय-ख़ाना कूँ
देखता हूँ हर कहाँ दस्ता है तुज मुख का सफ़ा
क़ुली क़ुतुब शाह
शेर
मैं भी इस सफ़्हा-ए-हस्ती पे उभर सकता हूँ
रंग तो तुम मिरी तस्वीर में भर कर देखो
अब्दुल हफ़ीज़ नईमी
शेर
हमारे सर पे पेच-ओ-ख़म का ये साफ़ा विरासत है
कि तुम पगड़ी समझते हो जिसे हम ताज कहते हैं
अतीब क़ादरी
शेर
यक-क़लम काग़ज़-ए-आतिश-ज़दा है सफ़्हा-ए-दश्त
नक़्श-ए-पा में है तब-ए-गर्मी-ए-रफ़्तार हुनूज़
मिर्ज़ा ग़ालिब
शेर
उस हर्फ़-ए-बा-सफ़ा ने तो सूली चढ़ा दिया
वो एक हर्फ़-ए-हक़ जो मिरे हाफ़िज़े में था