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शेर
छोड़ भी देते मोहतसिब हम तो ये शग़्ल-ए-मय-कशी
ज़िद का सवाल है तो फिर जा इसी बात पर नहीं
नातिक़ गुलावठी
शेर
कीजिए कार-ए-ख़ैर में हाजत-ए-इस्तिख़ारा क्या
कीजिए शग़्ल-ए-मय-कशी इस में किसी की राय क्यूँ
नातिक़ गुलावठी
शेर
ये ज़ख़्म-ए-अना काफ़ी है ऐ यूसुफ़-ए-दौराँ
इस चश्म-ए-ज़ुलेख़ा को तू ग़मनाक न करना