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शेर
ये बुत हिर्स-ओ-हवा के दिल के जब काबा में तोडूँगा
तुम्हारी सुब्हा में कब शैख़-जी ज़ुन्नार छोड़ूँगा
इश्क़ औरंगाबादी
शेर
मुसलमाँ काफ़िरों में हूँ मुसलामानों में काफ़िर हूँ
कि क़ुरआँ सर पे बुत आँखों में है ज़ुन्नार पहलू में
अहमद हुसैन माइल
शेर
ब-मअ'नी कुफ़्र से इस्लाम कब ख़ाली है ऐ ज़ाहिद
निकल सुबहे से रिश्ता सूरत-ए-ज़ुन्नार हो पैदा
वलीउल्लाह मुहिब
शेर
याद करते हैं तुझे दैर-ओ-हरम में शब-ओ-रोज़
अहल-ए-तस्बीह जुदा साहिब-ए-ज़ुन्नार जुदा
मीर मोहम्मदी बेदार
शेर
क्या खाएँ हम वफ़ा में अब ईमान की क़सम
जब तार-ए-सुब्हा रिश्ता-ए-ज़ुन्नार हो चुका
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
शेर
करें ताक़त गँवा कर आबिदाँ मय-ख़ाना कूँ सज्दा
क्या ज़ुन्नार में तस्बीह देखन रू-ए-ज़ेबारा
क़ुली क़ुतुब शाह
शेर
छोड़ कर तस्बीह ली ज़ुन्नार उस बुत के लिए
थे तो अहल-ए-दीं पर इस दिल ने बरहमन कर दिया
जुरअत क़लंदर बख़्श
शेर
गर यही ना-साज़ी-ए-दीं है तो इक दिन शैख़-जी
फिर वही हम हैं वही बुत है वही ज़ुन्नार है