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ग़ज़ल
थी तिरी याद भी क्या अंजुमन-आरा-ए-ख़याल
दिल में जो शोला उठा शम-ए-शबिस्ताँ समझा
मुंशी नौबत राय नज़र लखनवी
ग़ज़ल
कभी न आसूदा-ए-अमल हो मगर इरादा भी कम नहीं है
और इस इरादे का ऊँची आवाज़ में इआदा भी कम नहीं है
ख़ालिद इक़बाल यासिर
ग़ज़ल
मैं ने हाफ़िज़ की तरह तय ये किया है 'आबिद'
बा'द-अज़ीं मय न ख़ुरम बे-कफ़-ए-बज़्म-आराए
सय्यद आबिद अली आबिद
ग़ज़ल
चमन में ऐसी ही नग़्मा-सराई की कि बुलबुल को
सरीर-आरा-ए-गुलशन ने दिया ख़िलअ'त हज़ारी का
मीर मोहम्मदी बेदार
ग़ज़ल
एक ही जल्वा है जब हंगामा-आरा-ए-शुहूद
फिर वही शाहिद वही मशहूद होना चाहिए
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
ग़ज़ल
महफ़िल-आरा-ए-हक़ीक़त है मिरा ज़ौक़-ए-नज़र
दिल को ख़लवत-कदा-ए-बज़्म-ए-बुताँ करता हूँ