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ग़ज़ल
फ़रहाद ओ क़ैस ओ वामिक़ ओ अज़रा थे चार दोस्त
अब हम भी आ मिले तो हुए मिल के चार पाँच
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
कैसी अज़रा कैसी लैला कैसा वामिक़ कैसा मजनूँ
अब मशहूर जहाँ में क्या क्या मैं ही मैं हूँ तू ही तू है
नूह नारवी
ग़ज़ल
कैसे कैसे स्वाँग रचाए हम ने दुनिया-दारी में
यूँ ही सारी उमर गँवा दी औरों ग़म-ख़्वारी में
अज़रा नक़वी
ग़ज़ल
एयरपोर्ट स्टेशन सड़कों पर हैं कितने सारे लोग
जाने कौन से सुख की ख़ातिर फिरते मारे मारे लोग
अज़रा नक़वी
ग़ज़ल
किसी एहसास में पहली सी अब शिद्दत नहीं होती
कि अब तो दिल के सन्नाटे से भी वहशत नहीं होती