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ग़ज़ल
ये तिरे अद्ल-ओ-मुसावात में रक्खा हुआ है
तू ने तो अज्र भी दर्जात में रक्खा हुआ है
अरशद अब्बास ज़की
ग़ज़ल
जहाँ में अद्ल-ओ-मुरव्वत कहाँ हैं पोशीदा
उन्हीं को ढूँड के लाना है तुम भी साथ चलो
ज़ुबैर बहादुर जोश
ग़ज़ल
मुसावात अम्न भाई-चारगी अद्ल-ओ-अमाँ क्यों हो
जहाँ ऐवान-ए-शाही में लुटेरे रक़्स करते हैं
रियाज़ अनवर
ग़ज़ल
क्या क़यामत है कि वो लोग जो ख़ुद बिस्मिल थे
'अद्ल-ओ-इंसाफ़ की मीज़ान में क़ाबिल ठहरे
अनवर अली ख़ान सोज़
ग़ज़ल
सच जहाँ पा-बस्ता मुल्ज़िम के कटहरे में मिले
उस अदालत में सुनेगा अद्ल की तफ़्सीर कौन
परवीन शाकिर
ग़ज़ल
होश-ओ-हवास-ओ-अक़ल-ओ-ख़िरद दे गए जवाब
यानी नहीं हूँ मैं किसी क़ाबिल तिरे बग़ैर