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ग़ज़ल
मैं अपने जिस्म में कुछ इस तरह से बिखरा हूँ
कि ये भी कह नहीं सकता मैं कौन हूँ क्या हूँ
आबिद अदीब
ग़ज़ल
साकिन हैं जोश-ए-अश्क से आब-ए-रवाँ में हम
रहते हैं मिस्ल-ए-मर्दुम-ए-आबी जहाँ में हम