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ग़ज़ल
नहीं फ़क़्र ओ सल्तनत में कोई इम्तियाज़ ऐसा
ये सिपह की तेग़-बाज़ी वो निगह की तेग़-बाज़ी
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
बिठा के अर्श पे रक्खा है तू ने ऐ वाइ'ज़
ख़ुदा वो क्या है जो बंदों से एहतिराज़ करे
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
मैं ने दुनिया में फ़क़त देखे हैं जाने वाले
मैं ने देखे ही नहीं हैं कभी आने वाले
फ़ैसल इम्तियाज़ ख़ान
ग़ज़ल
पहली निगाह में ही वो दिल में उतर गया
फिर उस के बा'द दिल में जो कुछ था बिखर गया