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ग़ज़ल
मैं मुन्हरिफ़ था जिस से हर्फ़-ए-इंहिराफ की तरह
खुला वो धीरे धीरे बू-ए-इंकिशाफ़ की तरह
मुसव्विर सब्ज़वारी
ग़ज़ल
ख़ैर न मिलिए रोज़ रोज़ यूँही सही कभी कभी
उस से भी इंहिराफ़ है इस में भी कुछ कलाम है