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ग़ज़ल
गाली झिड़की ख़श्म-ओ-ख़ुशूनत ये तो सर-ए-दस्त अक्सर हैं
लुत्फ़ गया एहसान गया इनआ'म गया इकराम गया
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
न लेते काम गर सिब्त-ए-नबी सब्र-ओ-तहम्मुल से
लईनों का निगाह-ए-ख़श्म से आसाँ था मर जाना
महाराजा सर किशन परसाद शाद
ग़ज़ल
निगाह-ए-चश्म पुर-ख़श्म-ए-बुताँ पर मत नज़र रखना
मिला है ज़हर ऐ दिल इस शराब-ए-पुरतगाली में
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
है तुझ में भी तो 'जहाँदार' उस की शम्अ' का नूर
जो देखे ख़श्म से तो बर्क़ कर हज़र आवे
मिर्ज़ा जवाँ बख़्त जहाँदार
ग़ज़ल
अँधेरा आ गया आँखों के आगे ख़श्म सूँ मेरी
जभी उस छोकरे की बुल-हवस नें ज़ुल्फ़ टुक छूई
आबरू शाह मुबारक
ग़ज़ल
तुम जो कुछ चाहो करो जौर-ओ-इताब-ओ-ख़श्म-ओ-नाज़
कुछ नहीं बनता है आशिक़ से तहम्मुल के सिवा
रज़ा अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
अपने हक़ में माइल-ए-लुत्फ़-ओ-करम क़ातिल है आज
हर अदा-ए-ख़श्मगीं हिम्मत फ़ज़ा-ए-दिल है आज
रशीद शाहजहाँपुरी
ग़ज़ल
अपने हक़ में माइल-ए-लुत्फ़-ओ-करम क़ातिल है आज
हर अदा-ए-ख़श्म-गीं हिम्मत-फ़ज़ा-ए-दिल है आज
रशीद शाहजहाँपुरी
ग़ज़ल
भरम खुल जाए ज़ालिम तेरे क़ामत की दराज़ी का
अगर इस तुर्रा-ए-पुर-पेच-ओ-ख़म का पेच-ओ-ख़म निकले
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
वो उठे हैं ले के ख़ुम-ओ-सुबू अरे ओ 'शकील' कहाँ है तू
तिरा जाम लेने को बज़्म में कोई और हाथ बढ़ा न दे
शकील बदायूनी
ग़ज़ल
दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आए क्यूँ
रोएँगे हम हज़ार बार कोई हमें सताए क्यूँ