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ग़ज़ल
हमारे सपने कुछ इस तरह से जगाए रक्खेंगे रात सारी
कि दिन चढ़े तक तो मेरी बाहोँ में कसमसाई पड़ी रहेगी
आमिर अमीर
ग़ज़ल
हद्द-ए-नज़र तक सिर्फ़ धुआँ था बर्क़ पे क्यूँ इल्ज़ाम रखें
आतिश-ए-गुल से बाग़ जला हो ऐसा भी हो सकता है
मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद
ग़ज़ल
पत्थरों के बर्तनों में आँसुओं को क्या रखें
फूल को लफ़्ज़ों के गमलों में खिला सकते नहीं
बशीर बद्र
ग़ज़ल
सीने में छुपा रक्खेंगे हम राज़-ए-मोहब्बत
ऐ जान-ए-वफ़ा तुझ से मोहब्बत न करेंगे