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ग़ज़ल
अब नहीं ताब-ए-सिपास-ए-हुस्न इस दिल को जिसे
बे-क़रार-ए-शिकव-ए-बेजा समझ बैठे थे हम
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
سپاس شرط ادب ہے ورنہ کرم ترا ہے ستم سے بڑھ کر
ذرا سا اک دل ديا ہے ، وہ بھي فريب خوردہ ہے آرزو کا
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
वही शुक्र है जो सिपास है वो मलूल है जो उदास है
जिसे शिकवा कहते हो है गिला तुम्हें याद हो कि न याद हो
इस्माइल मेरठी
ग़ज़ल
तमन्ना-ए-ज़बान महव-ए-सिपास-ए-बे-ज़बानी है
मिटा जिस से तक़ाज़ा शिकवा-ए-बे-दस्त-ओ-पाई का
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
शुक्र-ओ-सिपास का मज़ा दे ही गया सुकूत-ए-यार
वस्ल-ओ-फ़िराक़ से अलग दर्द के हौसले गए
अज़ीज़ हामिद मदनी
ग़ज़ल
किस क़दर हैरत-असर निकली है मर्ग-ए-अंदलीब
इस सिपास-ए-जाँ से गुल लगता है बेगाना मुझे