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ग़ज़ल
दा'वा-ए-अम्न करें हाथ में चाक़ू रक्खें
और हमें दर्स कि जज़्बात पे क़ाबू रक्खें
हुसैन अहमद वासिफ़
ग़ज़ल
भरने लगता है कोई ज़ख़्म तो जब पूछते हैं
लोग यूँ तुझ से बिछड़ने का सबब पूछते हैं
शहज़ाद अंजुम बुरहानी
ग़ज़ल
मिलेगी शैख़ को जन्नत, हमें दोज़ख़ अता होगा
बस इतनी बात है जिस के लिए महशर बपा होगा
हरी चंद अख़्तर
ग़ज़ल
आते आते तर्फ़ मेरे मुड़ के फिर कीधर चले
जान-साहब! बिन तुम्हारे खा के ग़म हम मर चले
मिर्ज़ा अज़फ़री
ग़ज़ल
है करम उस का कि इंसाँ भी अज़ीमुश्शाँ हुआ
वर्ना थी क्या बात जो नूर-ए-ख़ुदा हैराँ हुआ