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ग़ज़ल
शादियाँ अपनी किया करते हैं जो ले के तलाक़
उन को सब लोग गदा इब्न-ए-गदा कहते हैं
हाशिम अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
मैं इक फ़क़ीर उसे दे चुका हूँ कब का तलाक़
मगर ये दुनिया कि मुझ से लगाओ चाहती है
हाशिम रज़ा जलालपुरी
ग़ज़ल
सिराज औरंगाबादी
ग़ज़ल
याद थीं हम को भी रंगा-रंग बज़्म-आराईयाँ
लेकिन अब नक़्श-ओ-निगार-ए-ताक़-ए-निस्याँ हो गईं
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
ताक़-ए-अबरू में सनम के क्या ख़ुदाई रह गई
अब तो पूजेंगे उसी काफ़िर के बुत-ख़ाने को हम