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ग़ज़ल
बद-गुमाँ मुझ से न ऐ फ़स्ल-ए-बहाराँ होना
मेरी आदत है ख़िज़ाँ में भी गुल-अफ़शाँ होना
नरेश कुमार शाद
ग़ज़ल
जब फ़स्ल-ए-बहाराँ आती है शादाब गुलिस्ताँ होते हैं
तकमील-ए-जुनूँ भी होती है और चाक गरेबाँ होते हैं
अनवर सहारनपुरी
ग़ज़ल
देती है वहशत-ए-दिल फ़स्ल-ए-बहाराँ की ख़बर
अब कहाँ वहशियों को जैब-ओ-गरेबाँ की ख़बर
यगाना चंगेज़ी
ग़ज़ल
निराले रंग में फ़स्ल-ए-बहाराँ आई है यारो
खिले हैं फूल भी इस बार लेकिन दिल नहीं लगता
मुबश्शिर अली ज़ैदी
ग़ज़ल
आमद-ए-फ़स्ल-ए-बहाराँ नहीं जीने देती
वुसअ'त-ए-चाक-ए-ए-गरेबाँ नहीं जीने देती
मुज़फ्फ़र अहमद मुज़फ्फ़र
ग़ज़ल
अब मैं पयाम-ए-फ़स्ल-ए-बहाराँ को क्या करूँ
दामन कहाँ से लाऊँ गरेबाँ को क्या करूँ