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ग़ज़ल
ये मुख़ासमत के जज़्बे ये महाज़ हासिदों के
मगर उम्र भर वो 'ज़ौक़ी' के मक़ाम तक न पहुँचे
मुहम्मद अय्यूब ज़ौक़ी
ग़ज़ल
हुए इत्तिफ़ाक़ से गर बहम तो वफ़ा जताने को दम-ब-दम
गिला-ए-मलामत-ए-अक़रिबा तुम्हें याद हो कि न याद हो
मोमिन ख़ाँ मोमिन
ग़ज़ल
रिंद रस्ते में आँखें बिछाएँ जो कहे बिन सुने मान जाएँ
नासेह-ए-नेक-तीनत किसी शब सू-ए-कू-ए-मलामत तो आए