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ग़ज़ल
कार-ए-जहाँ के मंसब से तू 'शाहिद' को मा'ज़ूल भी कर
काम उसे जो कुछ भी दे वो हस्ब-ए-ज़रूरत दे साईं
शाहिद कमाल
ग़ज़ल
मंसब-ए-दर्द से दिल ने तुम्हें मा'ज़ूल किया
तुम समझते थे ये जागीर तुम्हारे लिए है
इरफ़ान सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
मैं क्या क्या सोचता रहता हूँ जैसे बाद 'हसरत' के
हों जो मा'ज़ूल अंदाज़-ओ-अदा तो क्या तमाशा हो
मोहम्मद फ़य्याज़ हसरत
ग़ज़ल
दिल-ब-दर मैं भी हूँ और तू भी है मा'ज़ूल-नज़र
तू इजाज़त दे अगर मुझ को मैं तेरा हो जाऊँ