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ग़ज़ल
सर पे मेरे भी थी दस्तार-ए-फ़ज़ीलत लेकिन
मुझ को हासिल थी मिरे रब की मइय्यत लेकिन
कौसर तसनीम सुपौली
ग़ज़ल
काँटों की मअय्यत में बड़ी देर रहा है
जिस शख़्स की बातों में गुलाबों का असर है