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ग़ज़ल
अयाँ है बे-रुख़ी चितवन से और ग़ुस्सा निगाहों से
पयाम-ए-ख़ामुशी और वो भी दो दो नश्र-गाहों से
आरज़ू लखनवी
ग़ज़ल
अगर ये है तिरे दामन की हश्र-ओ-नश्र मियाँ
ज़मीं पे ख़ाक हमारा ग़ुबार ठहरेगा
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
ख़याल-ए-हश्र ओ फ़िक्र-ए-नश्र ऐ 'सीमाब' ला-हासिल
कि है तक़दीर में जो कुछ बहर-तक़दीर देखेंगे
सीमाब अकबराबादी
ग़ज़ल
रही दरमियाँ जो दुई तो क्या जो नज़र न एक हुई तो क्या
न हो इम्तियाज़ निगाह में मुझे उस नज़र की तलाश है
ऐमन अमृतसरी
ग़ज़ल
सज्दों को मिरे नश्र-ओ-इशाअत का नहीं शौक़
क्यूँ ग़ैर को तख़सीस-ए-इबादात बता दूँ
सय्यद तम्जीद हैदर तम्जीद
ग़ज़ल
मची है धूम मिरे शहर से निकलने की
कहाँ से नश्र हुई ये ख़बर नहीं मा'लूम