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ग़ज़ल
तिरे ख़िराम के पैरू हैं जितने फ़ित्ने हैं
क़दम सब आन के वक़्त-ए-ख़िराम लेते हैं
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
रफ़्तगी का है ये आलम कि तिरे वक़्त-ए-ख़िराम
पाँव जाते हैं कहीं और कमर और कहीं
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
कहते हैं ख़लख़ाल पा-ए-यार के वक़्त-ए-ख़िराम
हश्र फिर होगा बपा गर इक भी दाना फिर गया
अब्दुल मजीद ख़्वाजा शैदा
ग़ज़ल
दिल तो इन पाँव पे लोटे है मिरा वक़्त-ए-ख़िराम
शब को दुज़दी से भी पर उन को दबा सकते नहीं
जुरअत क़लंदर बख़्श
ग़ज़ल
न क़हर रफ़्तार-ए-नाज़ ढाए लचक न वक़्त-ए-ख़िराम आए
ख़ुदा ही नाज़ुक कमर बचाए कि पाएँचे वो सँभालते हैं
मिर्ज़ा आसमान जाह अंजुम
ग़ज़ल
भूरे ख़ान आशुफ़्ता
ग़ज़ल
नाज़ुक कमर वो ऐसे हैं वक़्त-ए-ख़िराम-ए-नाज़
ज़ुल्फ़ें जो खोलते हैं तो बल खाए जाते हैं
कल्ब-ए-हुसैन नादिर
ग़ज़ल
मिर्ज़ा आसमान जाह अंजुम
ग़ज़ल
ख़याल-ए-ख़ैर हसीनों में है कि वक़्त-ए-ख़िराम
ज़मीं को मादन-ए-लाल-ओ-गुहर बनाते हैं
सय्यद अमीन अशरफ़
ग़ज़ल
ख़िज़ाँ की रुत में शजर से कलाम करते हुए
तड़पने लगता हूँ अक्सर ये काम करते हुए