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ग़ज़ल
होंटों पर आहें क्यूँ होतीं आँखें निस-दिन क्यूँ रोतीं
कोई अगर अपना भी होता ऊँचे ओहदे-दारों में
हबीब जालिब
ग़ज़ल
ओहदे-दारों में भी ख़ुश्बू है हसीनों की सी
वा'दा कर लेते हैं और साफ़ मुकर जाते हैं
रियासत अली ताज
ग़ज़ल
ख़िराम फ़ित्ना-ए-रोज़-ए-जज़ा ब-ईं शोख़ी
तिरे ख़िराम के ओहदे से बर नहीं आती
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
'सग़ीर' ओहदे वग़ैरा हैं ज़रूरत और लोगों की
फ़क़ीरी में किसी का कोई भी मंसब नहीं होता
सग़ीर अहमद सग़ीर
ग़ज़ल
कोई भी यूँही नहीं फिरता किसी के इर्द-गिर्द
सब किया करते हैं ओहदे और रुत्बे का तवाफ़