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ग़ज़ल
बरस रही है हरीम-ए-हवस में दौलत-ए-हुस्न
गदा-ए-इश्क़ के कासे में इक नज़र भी नहीं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
वो मजबूरी मौत है जिस में कासे को बुनियाद मिले
प्यास की शिद्दत जब बढ़ती है डर लगता है पानी से
मोहसिन असरार
ग़ज़ल
था मैं शराब-दोस्त बहुत, मेरी ख़ाक के
कासे बनाने चाहिएँ कुछ, कुछ सुबू करें