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ग़ज़ल
लोगों ने ख़ुद ही काट दिए रास्तों के पेड़
'अख़्तर' बदलती रुत में ये हासिल नज़र का था
अख़्तर होशियारपुरी
ग़ज़ल
रंग बदलती इस दुनिया में सब कुछ बदल गया लेकिन
मेरे लबों पर तेरा फ़साना पहले भी था आज भी है
हस्तीमल हस्ती
ग़ज़ल
गर्द उड़ाते ज़र्द बगूले दर पर दस्तक देते थे
और ख़स्ता-दीवारों की पल भर में शक्ल बदलती थी
हम्माद नियाज़ी
ग़ज़ल
ऐसी बातों से बदलती है कहीं फ़ितरत-ए-हुस्न
जान भी दे दे अगर कोई तो क्या होता है
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
बदलती ही नहीं क़िस्मत मोहब्बत करने वालों की
तसव्वुर यार का जब तक 'फ़ना' पैहम नहीं होता
फ़ना बुलंदशहरी
ग़ज़ल
उरूस-ए-जाँ नया पैराहन-ए-हस्ती बदलती है
फ़क़त तम्हीद आने की है दुनिया से गुज़र जाना