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ग़ज़ल
हिजाब ओ जल्वे की कशमकश में उठाया उस ने नक़ाब आधा
इधर हुवैदा सहाब आधा उधर अयाँ माहताब आधा
कुँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर
ग़ज़ल
घुटी दिलों की मोहब्बत तो शहर बढ़ने लगा
मिटे जो घर तो हुवैदा हुए मकाँ क्या क्या
अमजद इस्लाम अमजद
ग़ज़ल
अब ज़बाँ से भी कहो 'शहज़ाद' क्यूँ ख़ामोश हो
दिल में जो कुछ था वो आँखों से हुवैदा हो चुका
शहज़ाद अहमद
ग़ज़ल
जो सुब्ह-ए-पीरी हुई हुवैदा सदा अदम से हुई ये पैदा
नमाज़ पढ़ के न अब ठहरिए सवेरे कसिए कमर को चलिए