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ग़ज़ल
उम्र भर मुझ से थी हर एक को बे-वज्ह ख़लिश
क्यूँकि मैं गुलशन-ए-आलम में कोई ख़ार न था
फ़हीम गोरखपुरी
ग़ज़ल
ख़ुलूस-ए-दिल से मैं ने सर तुम्हारे दर पे रक्खा था
मगर किस दिल से तुम ने पाँव मेरे सर पे रक्खा था
कुंदन अरावली
ग़ज़ल
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें