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ग़ज़ल
हक़ीक़त है सवाद-ए-ख़ातिर-ए-बे-मुद्दआ' मेरी
हरीम-ए-मा'रिफ़त-दा' मा-कदर ख़ुद ना-सफ़ा मेरी
साहिर देहल्वी
ग़ज़ल
रफ़्तार तो दिखला के ज़-ख़ुद रफ़्ता बना दो
नर्गिस की तरह है हमा-तन कब्क-ए-दरी आँख
ख़्वाज़ा मोहम्मद वज़ीर
ग़ज़ल
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
दाम-ए-हर-मौज में है हल्क़ा-ए-सद-काम-ए-नहंग
देखें क्या गुज़रे है क़तरे पे गुहर होते तक