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ग़ज़ल
वो उठे हैं ले के ख़ुम-ओ-सुबू अरे ओ 'शकील' कहाँ है तू
तिरा जाम लेने को बज़्म में कोई और हाथ बढ़ा न दे
शकील बदायूनी
ग़ज़ल
रग-ओ-पय में जब उतरे ज़हर-ए-ग़म तब देखिए क्या हो
अभी तो तल्ख़ी-ए-काम-ओ-दहन की आज़माइश है
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
क़ाएदे क्या हमें मालूम नहीं उल्फ़त के
बे-कम-ओ-कास्त मगर उन को पढ़ा सकते नहीं
जुरअत क़लंदर बख़्श
ग़ज़ल
कहा है किस ने तुम से चूमो-चाटो जा के पत्थर को
तुम्हारे ज़ाहिदो अब देन ओ ईमाँ का ख़ुदा हाफ़िज़
मिर्ज़ा आसमान जाह अंजुम
ग़ज़ल
अपनी नाकाम उमीदों के ख़म-ओ-पेच में गुम
अब्र-ए-कम-आब थे हम रिज़्क़-ए-समुंदर न हुए
अमजद इस्लाम अमजद
ग़ज़ल
सँवार शाना-ए-फ़न से तू ज़ुल्फ़-ए-क़ौस-ए-क़ुज़ह
तू ज़िंदगी के ख़म-ओ-पेच फिर कमान पे लिख