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ग़ज़ल
तू ख़ुद है ख़ार-अो-ज़बूँ हिर्स-ओ-आज़-ए-दुनिया में
खुलेगा तुझ पे कहाँ जो जहाँ है पोशीदा
अनवर सदीद
ग़ज़ल
कोई बताए तो हमें किस को नहीं है आज़-ए-इश्क़
कौन है इस जहान में बे-ग़म-ओ-बे-नियाज़-ए-इश्क़
मसीहुल्लाह ख़ाँ अता
ग़ज़ल
तुझ को जब तन्हा कभी पाना तो अज़-राह-ए-लिहाज़
हाल-ए-दिल बातों ही बातों में जताना याद है
हसरत मोहानी
ग़ज़ल
यूँही बे-सबब न फिरा करो कोई शाम घर में रहा करो
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है उसे चुपके चुपके पढ़ा करो