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ग़ज़ल
ग़ैर डेवढ़ी पर किया करते हैं आराइश का ज़िक्र
हल्क़ा-ए-बैरून-ए-दर ठहरी तुम्हारी चूड़ियाँ
मुनीर शिकोहाबादी
ग़ज़ल
रोज़-ओ-शब के हाल का लिखता था परचा रोज़-ओ-शब
कातिब-ए-आमाल मेरी डेवढ़ी का हरकारा था
हैदर अली आतिश
ग़ज़ल
ये वक़्त आने पे अपनी औलाद अपने अज्दाद बेच देगी
जो फ़ौज दुश्मन को अपना सालार गिरवी रख कर पलट रही है
तहज़ीब हाफ़ी
ग़ज़ल
गए होश तेरे ज़ाहिद जो वो चश्म-ए-मस्त देखी
मुझे क्या उलट न देते जो न बादा-ख़्वार होता
दाग़ देहलवी
ग़ज़ल
मोहब्बत इक न इक दिन ये हुनर तुम को सिखा देगी
बग़ावत पर उतरना और ख़ुद-मुख़्तार हो जाना