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ग़ज़ल
ख़ामोश अँधेरी रातों में जब सारी दुनिया सूती है
इक हिज्र का मारा रोता है और शबनम आँसू धोती है
तालिब बाग़पती
ग़ज़ल
मैं बहुत मश्शाक़ इक तैराक था लेकिन वो आँख
देख अब म'अ-कश्ती-ए-जाँ के डुबोती है मुझे
शहराम सर्मदी
ग़ज़ल
लेने भी दे अभी मौज लब-ए-साहिल के मज़े
क्यूँ डुबोती है उभरने की तमन्ना मुझ को
पंडित जगमोहन नाथ रैना शौक़
ग़ज़ल
न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता