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ग़ज़ल
ज़ख़्म-हा-ए-दिल को उन की ख़ाक-ए-पा याद आ गई
इश्क़ के आज़ार की आख़िर दवा याद आ गई
प्रेम लाल शिफ़ा देहलवी
ग़ज़ल
पारसा हम-राह ले जाएँगे पिंदार-ए-अमल
हम तो अपने साथ उन की ख़ाक-ए-पा ले जाएँगे
बद्र-ए-आलम ख़ाँ आज़मी
ग़ज़ल
अगरचे इब्न-ए-'अली की मैं ख़ाक-ए-पा भी नहीं
मगर मैं प्यास का दरिया हूँ कर्बला की क़सम
महशर आफ़रीदी
ग़ज़ल
ज़िंदगी अपनी न बदली है न बदलेगी कभी
ख़ाक-ए-पा ज़ीनत-ए-दस्तार भी हो जाए तो क्या