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ग़ज़ल
दिल-ए-नादाँ अभी ख़ूगर नहीं ये ग़म उठाने का
उठेगी तेरे दर से ये जबीं आहिस्ता आहिस्ता
रुख़्साना निकहत लारी उम्म-ए-हानी
ग़ज़ल
ख़ूगर-ए-क़ैद-ए-वफ़ा पर खुल चुका ज़िंदाँ का राज़
जुर्म थी वो क़ैद ये उस जुर्म की ताज़ीर है
मौलाना मोहम्मद अली जौहर
ग़ज़ल
किसी के बस का दिल-ए-मुज़्तरिब न था लेकिन
हमीं ने ख़ूगर-ए-अंदोह-ए-इंतिज़ार किया
पंडित जगमोहन नाथ रैना शौक़
ग़ज़ल
ख़ुद ही खुल जाते हैं अल्फ़ाज़ के मा'नी जिस पर
ख़ूगर-ए-नुत्क़-ए-'अजम कौन है हम जानते हैं
अमर रूहानी
ग़ज़ल
ख़ूगर-ए-सई-ए-मुकाफ़ात-ए-अमल बन के 'अतीक़'
फ़ाएदा तू भी हर आसानी-ओ-मुश्किल से उठा
अतीक़ अहमद अतीक़
ग़ज़ल
ख़ूगर-ए-रस्म-ए-सितम मैं हुआ 'दीवान' अब तो
अल-ग़रज़ अपने लिए अहल-ए-सितम अच्छे हैं
अल-हाज अल-हाफीज़
ग़ज़ल
ये हालत है कि बेदारी भी है इक ख़्वाब का आलम
मआज़-अल्लाह अपना ख़ूगर-ए-ख़्वाब-ए-गिराँ होना
अलीम अख़्तर मुज़फ़्फ़र नगरी
ग़ज़ल
मश्क़-ए-वफ़ा में क्या कहूँ ये ग़म-नसीब दिल
किन मुश्किलों से ख़ूगर-ए-ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ बना