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ग़ज़ल
हफ़ीज़ जौनपुरी
ग़ज़ल
दार ही बनती है ऐ दिल ज़ीना-ए-मेराज-ए-इश्क़
ख़्वाब-ए-आग़ाज़-ए-मोहब्बत की यही ताबीर है
मौलाना मोहम्मद अली जौहर
ग़ज़ल
मैं ये कहता हूँ कि आग़ाज़-ए-मोहब्बत है ख़राब
वो ये कहते हैं कि मोहब्बत का मआल अच्छा है
रंज हैदराबादी
ग़ज़ल
कुछ क़तरा-ए-मय ऊपर ऊपर फिर दर्द ही दर्द अंदर अंदर
आग़ाज़-ए-मोहब्बत ख़ूब मगर अंजाम से बचना मुश्किल है