आपकी खोज से संबंधित
परिणाम "aaKHir-e-kaar"
ग़ज़ल के संबंधित परिणाम "aaKHir-e-kaar"
ग़ज़ल
खींच लाएगी कोई मिस्रा-ए-तर आख़िर-ए-कार
ज़ुल्फ़ ज़ंजीर से नाज़ुक है मगर आख़िर-ए-कार
तालिब हुसैन तालिब
ग़ज़ल
ख़ार देहलवी
ग़ज़ल
न जाने क्या कहें ऐ 'ख़ार' आह-ए-सर्द को मेरी
मिरे नाले को जो बे-वक़्त की कहते हैं शहनाई
ख़ार देहलवी
ग़ज़ल
'ख़ार' है जल्वा-ए-अस्नाम से दिल ख़ुल्द-ए-बरीं
या परी-ज़ादों का मजमा' है परी-ख़ाने में
ख़ार देहलवी
ग़ज़ल
क़दम ले कर कलेजे से लगाते हैं कभी उस को
कभी होते हैं हम चश्म ओ लब ओ रुख़्सार के सदक़े
ख़ार देहलवी
ग़ज़ल
ख़ुदाई का अगर करते हैं दावा बुत नहीं बेजा
निगाह-ए-लुत्फ़ से देखें तो तक़दीरें बदलती हैं
ख़ार देहलवी
ग़ज़ल
ख़ार देहलवी
ग़ज़ल
मंज़िल-ए-'इश्क़ में ये होश-ओ-ख़िरद क्या होंगे
कि अगर वक़्त पड़े काम में ला भी न सकूँ
ख़ार देहलवी
ग़ज़ल
कहीं अंदर अंदर सुलगती थी चिंगारी कोई
मगर हादसा आख़िर-ए-कार शाम-ए-गुज़िश्ता हुआ है