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ग़ज़ल
सुना है ज़ख़्मी-ए-तेग़-ए-निगह का दम निकलता है
तिरा अरमान ले ऐ क़ातिल-ए-आलम निकलता है
हैरत इलाहाबादी
ग़ज़ल
तबीब आरवी
ग़ज़ल
जुम्बिश-ए-तेग़-ए-निगह की नहीं हाजत असलन
काम मेरा वो इशारों ही में कर जाते हैं
कल्ब-ए-हुसैन नादिर
ग़ज़ल
जुलूस-ए-तेग़-ओ-अलम जाने किस दयार का है
पस-ए-ग़ुबार भी इक सिलसिला ग़ुबार का है
मोहम्मद अहमद रम्ज़
ग़ज़ल
पा-ए-निगाह-ए-अहल-ए-नज़र के पड़े हैं नील
रुख़्सार-ए-नाज़नीं पे नहीं तिल अलग अलग
असद अली ख़ान क़लक़
ग़ज़ल
क्या पूछते हो जौहर-ए-तेग़-ए-निगाह-ए-नाज़
ये उस से तेज़ है जो तुम्हारी कमर में है
सय्यद अमीर हसन मारहरवी दिलेर
ग़ज़ल
चौरंग काटती है वो तेग़-ए-निगाह-ए-नाज़
अरमानों का भी ख़ून हुआ दिल जिगर के साथ
रियाज़ हसन खाँ ख़याल
ग़ज़ल
इस क़दर मज़बूत मौसम पर रही किस की गिरफ़्त
मैं कि मुझ से सीना-ए-आब-ओ-हवा रौशन हुआ