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ग़ज़ल
इन मह-रुख़ों के 'इश्क़ में 'अफ़सर' मिरा कलाम
आता है बाम-ए-अर्श से निखरा हुआ तमाम
अफ़सर सलीम अफ़सर
ग़ज़ल
हामिदुल्लाह अफ़सर
ग़ज़ल
अता की चादर-ए-गर्द उस ने अपने मरने वालों को
हुई ख़िल्क़त की ये सूरत कफ़न होता तो क्या होता
अफ़सर इलाहाबादी
ग़ज़ल
जब नज़र आया न साहिल उन की चश्म-ए-नाज़ में
क्या दिखाई देगा वो दरिया की गहराई के ब'अद
अफ़सर माहपुरी
ग़ज़ल
न जाने कौन सी मंज़िल है दिल के पेश-ए-नज़र
कि ख़ाक-ए-आलम-ए-इम्काँ तो छान ली मैं ने
मोहम्मद इसहाक़ अफ़सर आफ़ाक़ी
ग़ज़ल
रहे तो हम रहे दार-ओ-रसन के दीवाने
हमीं ने परवरिश-ए-जज़्बा-ए-अना की है