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ग़ज़ल
है जबीं ख़ाक पे और 'अर्श-ए-मु'अल्ला पे दिमाग़
नक़्शा आँखों में तिरे दर का खिंचा होता है
ऐश मेरठी
ग़ज़ल
ऐश मेरठी
ग़ज़ल
कुल्फ़त-ए-अफ़्सुर्दगी को ऐश-ए-बेताबी हराम
वर्ना दंदाँ दर दिल अफ़्शुर्दन बिना-ए-ख़ंदा है
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
सलीक़ा क्या करे इस में कोई बेताबी-ए-जाँ को
छुपाओ सौ तरह जब दिल हो बे-क़ाबू नहीं छुपती