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ग़ज़ल
ऐसे मौसम में भी शरह-ए-दिल किए जाता हूँ मैं
जब कि इस इज्माल की तफ़्सील ही मुमकिन नहीं
अब्बास ताबिश
ग़ज़ल
मरता भला है ज़ब्त की ताक़त अगर न हो
कितना ही दर्द-ए-दिल हो मगर चश्म-ए-तर न हो
हकीम मोहम्मद अजमल ख़ाँ शैदा
ग़ज़ल
दर्द को रहने भी दे दिल में दवा हो जाएगी
मौत आएगी तो ऐ हमदम शिफ़ा हो जाएगी