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ग़ज़ल
बरा-ए-हल्ल-ए-मुश्किल हूँ ज़ि-पा उफ़्तादा-ए-हसरत
बँधा है उक़्दा-ए-ख़ातिर से पैमाँ ख़ाकसारी का
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
उक़्दा-ए-इश्क़ अजब उक़्दा-ए-मोहमल है 'फ़िराक़'
कभी ला-हल कभी मुश्किल कभी आसाँ हो जाए
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
ब-फैज़-ए-बे-दिली नौमीदी-ए-जावेद आसाँ है
कुशायिश को हमारा उक़्दा-ए-मुश्किल-पसंद आया
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
जान देने में जो लज़्ज़त है बचाने में कहाँ
दिल किसी से जो बंधे उक़्दा-ए-ग़म खुलता है
वहीद अख़्तर
ग़ज़ल
दर्द का दर्द से रिश्ता है चलो ऐ 'मजरूह'
आज यारों से ये इक उक़्दा-ए-आसाँ तो खुला
मजरूह सुल्तानपुरी
ग़ज़ल
उक़्दा-ए-पेच-ओ-ख़म-ए-ज़ुल्फ़ का खुलना मा'लूम
राज़-ए-अलम से है ये सिलसिला-ए-राज़ जुदा
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
आह ये उक़्दा-ए-ग़म बज़्म-ए-तरब में भी 'हफ़ीज़'
बार-हा आँख छलक जाती है साग़र बन के