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ग़ज़ल
जाने कब सिलसिला-ए-ख़ैर-ओ-ख़बर का हो ज़ुहूर
ध्यान हम अन्फ़ुस ओ आफ़ाक़ पे रक्खे हुए हैं
गुलज़ार बुख़ारी
ग़ज़ल
ख़ल्वत में हुआ जल्वा सफ़र में भी वतन है
आफ़ाक़ में अन्फ़ुस है ऊलुल-अज़्म-ए-कमालत
पंडित जवाहर नाथ साक़ी
ग़ज़ल
सर-ब-सर अन्फ़ुस-ओ-आफ़ाक़ में है उस का ज़ुहूर
पर्दा उस रुख़ का अयाँ था मुझे मा'लूम न था
बाक़र आगाह वेलोरी
ग़ज़ल
शा'इरी में अन्फ़ुस ओ आफ़ाक़ मुबहम हैं अभी
इस्ति'आरा ही हक़ीक़त में ख़ुदा सा ख़्वाब है
काविश बद्री
ग़ज़ल
हम तो ज़ंजीर-ए-सफ़र शौक़ में डाले हुए हैं
वर्ना ये अन्फ़ुस-ओ-आफ़ाक़ खंगाले हुए हैं
इरफ़ान सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
उन पे ये अन्फ़ुस-ओ-आफ़ाक़ भी क़ुर्बान 'हयात'
मरकज़-ए-इश्क़ जिन्हें हम ने बनाया हुआ है
वकील अहमद हयात
ग़ज़ल
मिरे अशआ'र में आफ़ाक़-ओ-अनफ़ुस की कहानी है
मिरा हर लफ़्ज़-ए-शीरीं तर्जुमाँ है मेरी मिट्टी का