अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए

उबैदुल्लाह अलीम

अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए

उबैदुल्लाह अलीम

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    अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए

    अब इस क़दर भी चाहो कि दम निकल जाए

    मिले हैं यूँ तो बहुत आओ अब मिलें यूँ भी

    कि रूह गर्मी-ए-अनफ़ास से पिघल जाए

    मोहब्बतों में अजब है दिलों को धड़का सा

    कि जाने कौन कहाँ रास्ता बदल जाए

    ज़हे वो दिल जो तमन्ना-ए-ताज़ा-तर में रहे

    ख़ोशा वो उम्र जो ख़्वाबों ही में बहल जाए

    मैं वो चराग़ सर-ए-रहगुज़ार-ए-दुनिया हूँ

    जो अपनी ज़ात की तन्हाइयों में जल जाए

    हर एक लहज़ा यही आरज़ू यही हसरत

    जो आग दिल में है वो शेर में भी ढल जाए

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    फ़हद हुसैन

    फ़हद हुसैन

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    अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए उबैदुल्लाह अलीम

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