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ग़ज़ल
सिराज औरंगाबादी
ग़ज़ल
ये अक़्ल ओ दिल हैं शरर शोला-ए-मोहब्बत के
वो ख़ार-ओ-ख़स के लिए है ये नीस्ताँ के लिए
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
तो क्या इक हमारे लिए ही मोहब्बत नया तजरबा है
जिसे पोछिए वो कहेगा कि जी हाँ बड़ा तजरबा है
जव्वाद शैख़
ग़ज़ल
ब-जुज़ दीवानगी वाँ और चारा ही कहो क्या है
जहाँ अक़्ल ओ ख़िरद की एक भी मानी नहीं जाती