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ग़ज़ल
एक ऐसा शख़्स बनता जा रहा हूँ मैं 'मुनीर'
जिस ने ख़ुद पर बंद हुस्न ओ जाम ओ बादा कर लिया
मुनीर नियाज़ी
ग़ज़ल
जब हुआ इरफ़ाँ तो ग़म आराम-ए-जाँ बनता गया
सोज़-ए-जानाँ दिल में सोज़-ए-दीगराँ बनता गया
मजरूह सुल्तानपुरी
ग़ज़ल
मैं ने अब तक जितने भी लोगों में ख़ूद को बाँटा है
बचपन से रखता आया हूँ तेरा हिस्सा एक तरफ़