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ग़ज़ल
देर तक बाब-ए-हरम पर रुक के इक मजबूर-ए-इश्क़
सू-ए-बुत-ख़ाना ख़ुदा का ले के नाम आ ही गया
क़मर जलालवी
ग़ज़ल
ये और बात कि अनजाने लग़्ज़िशें हो जाएँ
मगर शुऊ'र-ए-हराम-ओ-हलाल रखते हैं
शान-ए-हैदर बेबाक अमरोहवी
ग़ज़ल
पोशीदा लफ़्ज़ लफ़्ज़ में है दास्तान-ए-कर्ब
'क़ुदसी' किताब-ए-ज़ीस्त का हर बाब देखना
औलाद-ए-रसूल क़ुद्सी
ग़ज़ल
हुस्न के बाब में 'अकबर' की सनद काफ़ी है
हम भी हर इक बुत-ए-कमसिन को परी कहते हैं
आल-ए-अहमद सुरूर
ग़ज़ल
बाब-ए-तिलिस्म-ए-होश-रुबा मिल गया मुझे
मैं ख़ुद को ढूँडता था ख़ुदा मिल गया मुझे