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ग़ज़ल
सैर ही करके आ जाएँगे फिर बाज़ार-ए-तमाशा की
जिस शय को भी हाथ लगाएँ क़ीमत बहुत ज़ियादा है
ज़फ़र इक़बाल
ग़ज़ल
बाग़ बाज़ार-ए-तमाशा आँख जूया-ए-बहार
चश्म-ए-नर्गिस या तन-ए-सर्व-ए-सही क्या देखना
सय्यद अमीन अशरफ़
ग़ज़ल
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
'क़ुदसी' तो अकेला नहीं मैदान-ए-सुख़न में
हर कूचा-ओ-बाज़ार में फ़न-कार बहुत हैं
औलाद-ए-रसूल क़ुद्सी
ग़ज़ल
फ़ज़ा-ए-ज़ौक़-ए-तमाशा है सर-बसर महदूद
वसीअ' दायरा-ए-हुस्न और नज़र महदूद
सय्यद वाजिद अली फ़र्रुख़ बनारसी
ग़ज़ल
हम तो हैं फ़क़त दिल-ज़दा-ए-ज़ौक़-ए-तमाशा
रम हम से अबस करते हो ऐ ज़ोहरा-निगाहो!