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ग़ज़ल
उफ़ ये ज़मीं की गर्दिशें आह ये ग़म की ठोकरें
ये भी तो बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता के शाने हिला के रह गईं
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
बख़्त-ए-वाज़ूँ से जले क्यूँ दिल न मुझ महरूर का
मर्हम-ए-काफ़ूर से मुँह आ गया नासूर का
अमीर मीनाई
ग़ज़ल
दावा-ए-मज्ज़ूबियत क्या मुझ से करे मंसूर 'वफ़ा'
बक उठना है सहल मगर बकते जाना सहल नहीं
मेला राम वफ़ा
ग़ज़ल
ज़ाहिर है हम से कुल्फ़त-ए-बख़्त-ए-सियाह-रोज़
गोया कि तख़्ता-ए-मश्क़ हैं ख़त-ए-ग़ुबार के
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
लूँ वाम बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता से यक-ख़्वाब-ए-खुश वले
'ग़ालिब' ये ख़ौफ़ है कि कहाँ से अदा करूँ
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
आया है यार फ़ातिहा पढ़ने को क़ब्र पर
बेदार बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता है ख़्वाब-ए-गिराँ में हम
हैदर अली आतिश
ग़ज़ल
रात सोहबत गुल से दिन को हम-बग़ल ख़ुर्शीद से
रश्क अगर कीजे तो रश्क-ए-बख़्त-ए-शबनम कीजिए
हैदर अली आतिश
ग़ज़ल
क्या रोऊँ ख़ीरा-चश्मी-ए-बख़्त-ए-सियाह को
वाँ शग़्ल-ए-सुर्मा है अभी याँ सैल ढल गया
मोमिन ख़ाँ मोमिन
ग़ज़ल
हर वक़्त मियाँ ख़ूब नहीं गालियाँ देनी
क्या बकते हो तुम यावा ज़बाँ अपनी सँभालो