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ग़ज़ल
वो अदा फ़रेब-ए-महफ़िल वो नज़र बला-ए-जाँ है
मुझे क्या यक़ीन आए कि वो मुझ पे मेहरबाँ है
बज़्म अंसारी
ग़ज़ल
कोई आज़ुर्दा करता है सजन अपने को हे ज़ालिम
कि दौलत-ख़्वाह अपना 'मज़हर' अपना 'जान-ए-जाँ' अपना