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ग़ज़ल
शेख़ साहब आप को बुत-ख़ाने में लाया 'मुनीर'
पीर-ओ-मुर्शिद बंदा-ए-दरगाह ने धोका दिया
मुनीर शिकोहाबादी
ग़ज़ल
अगर वो फ़ित्ना जो तुझ से मिले 'हातिम' तो कह दीजो
कि मंसूबे तिरे सब बंदा-ए-दरगाह जाने है
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
ग़ज़ल
बे-फ़िक्र रहे बंद-ए-नक़ाब-ए-रुख़-ए-जानाँ
हम से कभी क़ुफ़्ल-ए-दर-ए-गुलज़ार न टूटे