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ग़ज़ल
बंगले में जा के ख़ाक रहे कोई 'मुसहफ़ी'
कर दें हैं आदमी का यहाँ जी उचाट साँप
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
पास उस के पैसा बंगले गाड़ियाँ शोहरत भी है
'अश्क' जी वो शख़्स फिर भी ख़ानदानी क्यूँ नहीं
परवीन कुमार अश्क
ग़ज़ल
कलकत्ता में हर दम है 'मुनीर' आप को वहशत
हर कोठी में हर बंगले में जंगला नज़र आया
मुनीर शिकोहाबादी
ग़ज़ल
इस नफ़ासत का मैं कुश्ता हूँ कि इक तो उस ने
बंगले पानों से हाथों में बँधाई मेहंदी
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
जो बे-घर हैं उन्हें बे-शक ख़ुशी होती तो है दिल से
अमीर-ए-शहर के बंगले की जब दीवार गिरती है
सईद अहसन
ग़ज़ल
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
बाग़-ए-बहिश्त से मुझे हुक्म-ए-सफ़र दिया था क्यूँ
कार-ए-जहाँ दराज़ है अब मिरा इंतिज़ार कर
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
आज वाँ तेग़ ओ कफ़न बाँधे हुए जाता हूँ मैं
उज़्र मेरे क़त्ल करने में वो अब लावेंगे क्या
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
बर्ग-ए-गुल पर रख गई शबनम का मोती बाद-ए-सुब्ह
और चमकाती है उस मोती को सूरज की किरन